दीपावली - गतिविधियाँ

Light of Spiritual Wisdom
(Excerpt From Divine Discourse)


Deepavali is a festival of lights. It is the victory of good over evil and knowledge over ignorance. In the Northern parts of India, the festival of Deepawali is celebrated to commemorate the return of Lord Rama to Ayodhya, after defeating Ravana. In the southern parts of India, Deepavali is celebrated as the day Lord Krishna defeated the demon Narakasura.

The life-story of Narakasura reveals the magnitude of his wickedness. His entire realm was plunged in darkness. No lights burnt in the homes or in streets. No woman could be seen anywhere in the open. He imprisoned thousands of princesses and tortured innumerable women. Unable to bear these indignities, the women appealed to Krishna for succour. As Narakasura had inflicted sufferings on women, he had to be punished by a woman. For this reason, Krishna took his consort Satyabhama with Him and directed her to destroy him in a battle.

The following day is Amavasya (New Moon Day). On this day, Krishna freed from prison 16,000 Gopikas from the clutches of Narakasura. This was the day of liberation for the Gopikas. It is a moonless day when the night is utterly dark. The Gopikas prayed that as on that day, they had got the light of freedom, it should be duly marked by illuminations. Hence lamps are lit on this day.

The lamp points to another significant fact. Wherever it may be placed, the flame goes upwards and never moves down. Likewise, the flame of Jnana (Spiritual Wisdom) leads one to a sublime level through the path of Righteousness.

Four elements are required to light a lamp. If you want to light a lamp, you need four things. First a container, second oil, third a wick and fourth a match box. If any one of these is lacking, you cannot light the lamp. This lamp can, however, remove only the outside darkness. How is the darkness in the heart to be removed?

It can be removed only by Jnana Jyoti (the Light of Wisdom) and by nothing else. How is this Light of Wisdom, this spiritual light, to be lit? This also needs four elements. Vairagya (detachment) is the container. Bhakti (devotion) is the oil. Ekagrata (one-pointed concentration) is the wick. Jnana (Knowledge of the Supreme Truth) is the match stick. Without all the four, the Light of Spiritual Wisdom cannot be got.

Of the four, the primary requisite is the spirit of Vairagya (renunciation). Without this detachment, all knowledge of scriptures is of no avail. What is this detachment? It is the absence of attachment to the body. The ego-feeling, which makes one think of the "I" all the time, should be given up. The sense of Mamakara (possessiveness) and the ego-feeling are the causes of raga (attachment). How is this disease of attachment to be eradicated? By the process of self-enquiry.

When you realise the impermanence of the body and all the sensory experiences, you acquire the sense of Vairagya (detachment). It only means you should discharge your duties, treating the body as a God-given instrument for this purpose. “Paropakaaraartham Idam Shareeram” (This body is for the purpose of helping others). It should not be used solely for selfish ends. Deepavali has to be observed as a day for getting rid of all the bad qualities in us, symbolised by the demon Narakasura.

The Gopikas who were freed on that day represent the imprisoned good qualities in us. They should be manifested effulgently. This is the inner significance of the festival. As long as the demonic qualities remain in man, he will be immersed in darkness. Bad qualities and thoughts have to be got rid of altogether.

Swami had said “I desire that our festivals and the holy days should be observed in the right spirit, with an understanding of their inner significance. The destruction of the Narakasura symbolises the destruction of evil and the restoration of what is good.“.

This is Deepavali in the true sense!

Source: Divine Discourse in the Prasanthi Mandir, November 9, 1988.

चिन्न कथा
दीपावली - दिव्य सन्देश का प्रकाश

नरकचतुर्दशी का पर्व (जिसे छोटी दीपावली के रूप में भी जाना जाता है), मनुष्य को यह याद रखना सिखाता है कि चरित्र, कैसे नियति तय करता है, उपलब्धियों को रेखांकित करता है और किसी को परमात्मा या असुर के रूप में सीमांकित करता है।

नरका, जिसके नाम पर इस दिन का नाम रखा गया, मानव था। लेकिन जब से वह एक दानव के रूप में बड़ा हुआ, उसने सार्थक शीर्षक अर्जित किया, "नरकासुर"। अपने राक्षसी प्रवृत्ति के कारण वह नरक की ओर अग्रसर हुआ। वह एक राजा था, जिसने अपनी प्रजा को अपने दुष्विचारों एवं आदेश से अपने जैसा दुष्ट व्यक्ति बना दिया था। उसके राज्य के लोग दुराचार और हिंसा के नशे में लिप्त थे।

भगवान ने नरकासुर को खत्म करने और लोगों को बर्बादी से बचाने का एवं उन्हें विनम्रता और अच्छाई के पवित्र सात्विक मार्ग की ओर मार्गदर्शन करने का फैसला किया। यहाँ, आपको एक अजीब रणनीति पर ध्यान देना चाहिए जिसे प्रभु ने नियोजित किया था। भगवान ने नरकासुर के राज्य पर आक्रमण किया, एक बार नहीं, बार-बार! बेशक, वह पहले अभियान के दौरान ही असुरों के विनाश के कार्य को पूरा कर सकते थै। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने उसे बार-बार उग्र क्रोध में विस्फोट करने के लिए मजबूर किया, और प्रभु के प्रत्येक हमले ने उसे बार-बार कमजोर बना दिया। उसकी प्रतिरोध करने की शक्ति क्रमशः क्षीण होती चली गई।

क्रोध किसी की शक्ति को बहुत कम कर देता है। इसलिए, भगवान ने नरकासुर को क्रोध में, बार-बार भड़काया, और जब वह दुर्बल और अस्थिर हो गया, तब भी प्रभु ने निश्चय किया कि वह उनके हाथों मृत्यु के योग्य नहीं है। उन्होंने सत्यभामा को अपने साथ लिया और उन्हें आततायी नरकासुर का वध करने को कहा। वह इसे आसानी से कर पाईं, क्योंकि नरकासुर की तीन-चौथाई शक्ति भगवान की रणनीति से घट गई थी। यह दिवस, दीपावली का त्यौहार, ऐसे असुर के विनाश के स्मरण के लिए है। इस उत्सव का महत्व यह है कि इस दिन भगवान ने अज्ञान के अंधेरे का वध किया और लोगों में आत्मा के प्रति जागरूकता का अभाव गायब हो गया। जहाँ आत्मिक जागरूकता का प्रकाश चमकता है, बुरे विचार, दुष्ट वाणी और दुष्कर्म भय से भाग जाते हैं। इसलिए, हमें अपनी वास्तविकता पहचानने के लिए ज्ञान को विकसित करना चाहिए
- बाबा

रंगोली में रंग भरने वाला पृष्ठ

सीडी से निर्मित दीपक अथवा मोमबत्ती-धारक
(निरूपयोगी वस्तुओं से उत्कृष्टता का निर्माण)

इस दीपावली पर बेकार सी डी का उपयोग करके अपना खुद का दिया या मोमबत्ती-धारक बनाएं। व्यर्थ वस्तुओं से उपयोगी कलाकृतियों को बनाने की यह कला आपके घरों को प्रकाश और दिव्य आनंद से भर देगा!

समग्रित मूल्य:
  • रचनात्मकता
  • धीरज
  • निरूपयोगी वस्तुओं का उपयोग

आवश्यक सामग्री:
  1. अपशिष्ट सी डी
  2. फ़ोम शीट
  3. सुगंधित मोमबत्तियाँ या मिट्टी के दिये
  4. गोंद

गतिविधि:


  1. फोमशीट पर गोल घेरे को ट्रेस करें और इसे काट लें, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।


  2. फोम के चार जोड़ी घेरे (कट आउट) के साथ तैयार हो जाएं।
  3. सी डी पर गोंद लगाएं और काटे हुए घेरों को चिपकाएं।
  4. सी डी के दूसरे किनारे पर भी ऐसा ही करें।


  5. दिये या सुगंधित मोमबत्तियों को केंद्र में रखें।
  6. एक सरल और सुंदर मोमबत्ती या दिया-धारक तैयार है।

चूड़ियों द्वारा निर्मित दीपक-धारक

स्वामी ने कहा है कि सभी त्यौहारों के आंतरिक महत्व को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। त्यौहारों के दौरान, लोग सुबह जल्दी स्नान करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और अपने घरों और आस-पास स्वच्छता रखते हैं। वेद "अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणस्थितः" की घोषणा करते हैं, जिसका अर्थ है कि ईश्वर हमारे भीतर, बाहर और सर्वत्र मौजूद हैं। इस प्रकार आंतरिक और बाह्य दोनों रूप से शुद्ध होना आवश्यक है। जैसे पानी हमारे शरीर को साफ रखने में मदद करता है, वैसे ही प्रेम हमारे दिल को साफ रखता है। इस प्रकार त्यौहारों के आंतरिक महत्व को समझना, उत्सव को और अधिक सार्थक बनाता है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, दीपावली रोशनी का त्यौहार है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। जब नरकासुर, पौराणिक असुर मारा गया, तो लोग बहुत खुश हुए और इस अवसर पर दीप जलाकर जश्न मनाया। दीपावली शब्द का अर्थ है "दीपों की अवलि यानि पंक्ति"।

इस दीपावली पर हम पुरानी चूड़ियों का उपयोग करके एक दीपक- धारक बनाएंगे। बेकार चीजों से उत्तम वस्तुओं की निर्माण की यह शिल्प कला, दीपावली समारोह को निश्चित रूप से आनंद से भर देगी।

गतिविधि में निहित मूल्य:
  • धीरज
  • रचनात्मकता
  • बेकार / पुराने सामान से कलाकृति बनाना
  • आसपास का वातावरण स्वच्छ रखना।

आवश्यक सामग्री:
  1. पुरानी चूड़ियाँ
  2. गरम चाय का बर्तन आदि रखने की गोल टिकली
  3. गोंद
  4. दिये या मोमबत्तियाँ

गतिविधि:


  1. अपने संग्रह से पुरानी चूड़ियाँ चुनें।
  2. चूड़ियाँ इस प्रकार चुनें जो आसानी से प्रकाश को प्रतिबिंबित करती हों और उन पर की गयी डिजाइन जटिल हो।
  3. एक छोटा बुर्ज (टावर) बनाने के लिए, एक साथ 6 से 8 चूड़ियों को गोंद लगाएं और एक के ऊपर एक रखें। चूड़ियाँ दीए की लौ को पूरी तरह से ढँक देंगी।
  4. एक गरम चाय का बर्तन आदि रखने की गोल टिकली पर पूरे बुर्ज (टावर) को गोंद से चिपका दें। इसमें एक दिया रखें और लौ को फैलाने वाली हवा के बारे में चिंता न करें। दीए से उत्पन्न गर्मी को गोल टिकली अवशोषित करेगा।
  5. एक सुंदर चूड़ी दीपक-धारक तैयार है।

दीप-सज्जा

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि दीपावली रोशनी का त्यौहार है। दीपावली शब्द 'दीप' और 'अवली' शब्दों से मिलकर बना है। ‘दीप’ का अर्थ है मिट्टी के दिये या दीपक जबकि ‘अवली’ का अर्थ पंक्ति या श्रृंखला होता है।

यह माना जाता है कि भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद घर लौटे थे और अयोध्या के लोगों ने भगवान के आगमन पर मार्ग रोशन करने के लिए अपने घरों के बाहर पंक्तियों में मिट्टी के दिये जलाए थे। यह अमावस्या की रात थी। इस दीपावली पर आइये हम अपने घर के हर नुक्कड़ और कोने को रंग-बिरंगे मिट्टी के दियों से रोशन करें और उसमें अपनी इच्छाओं, मिथ्यापन और आसक्ति को जलाकर खुद को भी प्रबुद्ध करें।


समग्रित मूल्य :
  • धीरज
  • रचनात्मकता
  • दीप प्रज्वलन पवित्रता, अच्छाई एवं सकारात्मक ऊर्जा के प्रसार को सूचित करता है।
  • प्रस्तुति कौशल

आवश्यक सामग्री:
  1. मिट्टी का दिया
  2. ग्लिटर, मोती, आदि।
  3. ऐक्रेलिक पेंट
  4. शिल्प वाला गोंद
  5. रंग चित्रण तूलिका (पेंटिंग ब्रश)

गतिविधि:

  1. ऐक्रेलिक पेंट्स के साथ दीये को पेंट करें और इसे सूखने दें, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है।
  2. फिर छोटे मोतियों, छोटे रंग के पत्थरों, ग्लिटर आदि के साथ उसकी सजावट करें।
  3. यह हमारी रचनात्मकता के आधार पर विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है। नीचे दिए गए चित्रों में कुछ नमूने दिखाए गए हैं।





आरती थाल की सजावट

आमतौर पर पूजा की सभी रस्में पूरी होने के बाद भगवान की आरती उतारी जाती है। आरती, तेल का दीपक या कपूर जलाकर की जाती है। आरती भगवान के प्रति एकनिष्ठ भक्ति की अभिव्यक्ति है।

इस दीपावली पर हम कुंदन और मोतियों से एक सुंदर आरती की थाली बनाएं और केंद्र में एक सुंदर दिया रखें।

समग्रित मूल्य:
  • धीरज
  • रचनात्मकता
  • प्रस्तुति कौशल

आवश्यक सामग्री:
  1. मिट्टी का दिया
  2. कोई भी स्टील प्लेट, मिट्टी की प्लेट या पीतल की प्लेट
  3. मोती, कुंदन पत्थर, आदि।
  4. गोंद
  5. एक्रिलिक पेंट और ब्रश

गतिविधि:
  1. एक्रिलिक पेंट का उपयोग करके दीये और प्लेट को पेंट करें।
  2. इसे सूखने के लिए छोड़ दें।
  3. तस्वीर में दिखाये गये नमूने के अनुसार, थाली को मोतियों और सीक्वेंस से सजाना शुरू करें।
  4. प्लेट के केंद्र में चित्रित दीया रखें।
  5. दीपावली आरती की थाली तैयार है।
  6. अन्य कई स्वरूप (पैटर्न) इस तरह किए जा सकते हैं, कुछ नमूने नीचे दिए गए हैं।



सी डी - दीवार लटकन (वॉल हैंगिंग)
(निरूपयोगी वस्तु से उपयोगी वस्तु का निर्माण)

हम में से अधिकांश घरों में बेकार सी डी रहती हैं। हम इसे एक अद्भुत और रंगीन शिल्प बनाने के लिए उपयोग कर सकते हैं। यहाँ, आइए देखें कि बेकार सी डी के साथ सुंदर दीवार लटकन को कैसे बनाएं।


गतिविधि में धारित मूल्य:
  • रचनात्मकता
  • धीरज
  • चीजों का प्रभावी ढंग से उपयोग करना।

आवश्यक सामग्री:
  1. बेकार की सी डी।
  2. एक्रिलिक पेंट (कोई भी रंग)
  3. कुंदन पत्थर, मोती, सीक्वेन्स, सुनहरे रंग का फीता, आदि
  4. कोई भी छोटा शो पीस या किसी प्राकृतिक दृश्य की तस्वीरें
  5. शिल्प गोंद

गतिविधि:
  1. पुरानी सी डी लें, ऐक्रेलिक पेंट के साथ केंद्र भाग को रंग दें।
  2. कुंदन पत्थरों, मोतियों और सीक्वेन्स के साथ सी डी को सजाने की शुरुआत करें। (ऊपर की तस्वीर में दिखाए गए नमूने के अनुसार)
  3. किसी भी छोटे शो पीस, भगवान की तस्वीर या प्राकृतिक दृश्य की तस्वीर को केंद्र में चिपकाएं।
  4. सुनहरे फीते के छोटे टुकड़े को काटें और एक यू आकार बनाएं और इसे सी डी के पीछे चिपका दें, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है।
  5. सुंदर और सजीव दीवार-लटकन (वॉल हैंगिंग) हमारी दीवारों को सजाने के लिए तैयार है।
  6. आइए, हम इस अद्भुत गतिविधि को आजमाएँ और इस दीपावली पर अपने घर को सजाएँ। कुछ और नमूने नीचे दिए गए हैं।






वैचारिक चिंतन
(बाल विकास कक्षा में दीपावली-गतिविधि)

गुरु द्वारा बच्चों को बोर्ड पर लिखकर एक विषय दिया जाए "दीपावली"। इस विषय को मुखाग्र बोलकर भी स्पष्ट किया जाए। छात्रों को इस विषय से संबंधित कुछ शब्द कहने के लिए कहें। उदाहरण के लिए प्रकाश, कृष्ण, तोरण, नए वस्त्र, तेल स्नान, नरकासुर, सत्यभामा, राम, सीता, लक्ष्मण, रावण, लक्ष्मी पूजा, इत्यादि, शब्द बोर्ड पर लिखें और उनको पुस्तिकाओं में भी लिखने को कहें। (कृपया, शब्दों को व्यवस्थित न करें, न ही क्रमबद्ध करें।) कितने और कौन से शब्द आते हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है !!!

नोट: संबंधित शब्द गुरु से नहीं, छात्रों से आने चाहिए। यदि गुरु किसी बच्चे द्वारा दिए गए शब्द और विषय के बीच संबंध नहीं पाते हैं, तो उसे "नहीं" कहने के बजाय, उससे पूछें कि उसे "क्यों" लगता है कि वह शब्द विषय से संबंधित है।

सी डी द्वारा निर्मित दीपक-आधार (स्टैंड)
(व्यर्थता से उत्कृष्टता का निर्माण - गतिविधि)


दीपावली सभी के द्वारा बहुत धूम-धाम से मनाई जाती है और यह एक ऐसा त्यौहार है जो घरों को प्यार, मस्ती और उल्लास से भर देता है।

ज्योतिर्मय दीपक, उत्सव का एक अभिन्न अंग हैं। इन दिनों बाजार सुंदर दियों से भर जाते हैं। मिट्टी से बने दियों को रंगों से चित्रित भी किया जा सकता है और घर पर सजावट के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार, इस शिल्प गतिविधि से घर को सुसज्जित किया जा सकता है। दिया-धारकों (दिया-स्टैंड) को भी घर पर अपशिष्ट पदार्थों के साथ बनाया जा सकता है।

हम एक वीडियो प्रस्तुत करने में खुशी महसूस करते हैं, जिसमें दिखाया गया है कि पुराने सीडी और लंबे बेलनाकार कैन का उपयोग करके दिया-धारक (दिया-स्टैंड) कैसे बनाया जा सकता है। यह गतिविधि समूह II के छात्रों के लिए उपयुक्त है।

इस दीपावली पर हम ज्ञान के दीप जलाएं और सत्य की ओर अग्रसर हों, चिरस्थायी आनंद की दुनिया में! आइए, व्यर्थ वस्तुओं का नवीनीकरण करके, पर्यावरण की रक्षा करके हम दीपावली मनाएं एवं स्वहस्तनिर्मित कलाकृतियों को समर्पित कर सभी के लिए प्रार्थना करें।

द्वार-तोरण (स्टैंड)
(समूह I के छात्रों के लिए दीपावली शिल्प कला - गतिविधि)


त्यौहारों के दौरान, हमारे घरों के दरवाजों के बाहर तोरण, मालाएं या डोर हैंगिंग लटकाए जाने की प्रथा है। तोरण एक सजावटी माला है जो आमतौर पर हमारे घरों के प्रवेश द्वार पर या पूजा कक्ष के द्वार पर लटका दी जाती है। पारंपरिक रूप से तोरण को आम या नीम के पत्तों के साथ बनाने की प्रथा है। ये पत्तियाँ, कीटों को दूर रखती हैं और माना जाता है कि ये नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती हैं। गेंदे जैसे फूलों का उपयोग भी तोरण बनाने के लिए किया जाता है क्योंकि वे लंबे समय तक रहते हैं।

त्यौहार में, एक शिल्प गतिविधि के रूप में, तोरण को मोतियों, कागजों और अन्य शिल्प सामग्री के साथ बनाया जा सकता है। यहाँ एक वीडियो है जो दिखाता है कि विभिन्न रंगों के कागजों के साथ एक द्वार-तोरण को कैसे बनाया जाए। यह गतिविधि ग्रुप I के छात्रों के लिए उपयुक्त है। यह गतिविधि, समूह गतिविधि के रूप में भी की जा सकती है जो निश्चित रूप से उत्सव में उत्साहवर्धक हो सकती है। तो आइये, इस दीपावली पर इन रचनात्मक पेपर वाले तोरण के साथ उत्सव में शामिल होवें!

दीपक- रंगोली

दीपावली, रोशनी का पर्व है और इस त्यौहार पर सजावट के तौर पर रंगोली बनाने की परंपरा भारत के कई हिस्सों में प्रचलित है। दीपावली प्रकाश और प्रेम का पाठ पढ़ाती है। "तमसो मा ज्योतिर्गमय" - हे प्रभु अंधकार से, प्रकाश की ओर मेरा नेतृत्व करो। मुझे अज्ञान के अंधेपन से सत्य की दृष्टि में ले चलो, क्योंकि सत्य उसमें प्रतिबिंबित होगा । दीपावली के इस अवसर पर, हम अपने घर को दीप-रंगोली से सजाएँ।

समग्रित मूल्य:
  • रचनात्मकता
  • कला कौशल
  • धीरज
  • पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिए प्रयास करना

आवश्यक सामग्री:
  1. विभिन्न रंगों के रंगोली का पाउडर
  2. सफेद रंगोली पाउडर
  3. रंगोली सजाने के लिए मोती

गतिविधि:
  1. चॉकपीस से दीपक की रूपरेखा तैयार करें।
  2. बनाए गये दीपक को रंगोली के विभिन्न सजीव, सुंदर रंगों से रंग दें।
  3. गोल्डन मोतियों, पत्थरों, आदि के साथ रंगोली की सजावट करें।
  4. - जननी राघवन द्वारा बनाई गई रंगोली

SHRINE DECORATION
(BEST OUT OF WASTE ACTIVITY)

Participation in Family work is very important for children. They should render whatever little service they can, say by the way of helping mother in the domestic chores, maintaining the cleanliness of the house, etc., This Deepavali let us decorate the shrine with old table top calendars while the mothers are busy preparing sweets for Deepavali.

VALUES INCULCATED :
  • Creativity
  • Patience
  • Making art out of waste
  • Participation in Family Work

MATERIALS REQUIRED :
  1. Old Table top calendars (Preferably with Gods Pictures)
  2. Beads and kundan stones
  3. Fresh/artificial flowers
  4. Fresh/artificial leaves

ACTIVITY :

  • 1. Cut the pictures of your choice from the calendar

  • 2. Organise the pictures

  • 3. Decorate with Beads and Kundan stones

  • 4. Out line with flowers and leaves
दीपावली रंग की चादर